Indian Election | भारत में चुनाव पर कितना होता है खर्च, लोकतंत्र की कीमत कितनी भारी?

भारत में हर आम चुनाव पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हैं। चुनावी फंडिंग, प्रचार, सुरक्षा और तकनीक पर बढ़ता खर्च देश के लोकतंत्र की असल कीमत को उजागर करता है। जानिए, आखिर भारत में इतना पैसा क्यों और कहां खर्च होता है।

भारत के 2024 लोकसभा चुनाव अब तक का सबसे महंगा

भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, लेकिन इस लोकतंत्र को बनाए रखने की कीमत भी उतनी ही बड़ी है।

हर बार जब देश चुनावी मोड में आता है, तब सरकारी और निजी दोनों स्तरों पर अरबों रुपये बहाए जाते हैं।

यह खर्च सिर्फ मतदाता सूची या मतदान मशीनों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रचार, सुरक्षा, तकनीकी व्यवस्था, और राजनीतिक दलों का निजी प्रचार अभियान भी शामिल होता है।

भारत के 2024 लोकसभा इलेक्शन को अब तक का सबसे महंगा चुनाव माना गया।

सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 के आम इलेक्शन पर करीब 1.2 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए।

यह रकम अमेरिका के 2020 के राष्ट्रपति इलेक्शन खर्च के करीब पहुंच गई थी, जिससे भारत अब दुनिया का सबसे महंगा इलेक्शन कराने वाला देश बन गया है।

लोकतंत्र की कीमत: हर चुनाव में अरबों का खेल, सवाल अब पारदर्शिता का"
चुनाव 2025

चुनाव मे खर्च का ब्योरा

  • 1. सरकारी खर्च: इलेक्शन आयोग, सुरक्षा बलों, और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर सरकार द्वारा किया जाने वाला खर्च चुनावी प्रक्रिया का आधिकारिक भाग होता है। इसमें मतदान केंद्रों की व्यवस्था, मतदान कर्मियों का प्रशिक्षण, सुरक्षा, और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) की देखरेख शामिल है। 2019 के आम इलेक्शन पर सरकार ने लगभग 7,000 करोड़ रुपये खर्च किए थे।
  • 2. राजनीतिक दलों का प्रचार खर्च: असली दांव तो यहां लगता है। राजनीतिक दल टीवी विज्ञापन, सोशल मीडिया कैंपेन, डिजिटल प्रचार, और रैलियों में करोड़ों खर्च करते हैं। केवल सोशल मीडिया प्रचार पर ही 2024 के दौरान करीब 6,500 करोड़ रुपये खर्च का अनुमान लगाया गया था।
  • 3. अघोषित धन का प्रवाह : चुनावी बॉन्ड और नकद राशि के जरिए इलेक्शन में “ब्लैक मनी” का इस्तेमाल भी बढ़ता जा रहा है। आयोग को रिपोर्ट्स मिलती हैं कि बड़ी मात्रा में नकदी और शराब बांटी जाती है। 2024 में अकेले आयकर विभाग ने इलेक्शन के दौरान करीब 8,000 करोड़ रुपये की अवैध संपत्ति जब्त की थी।
  • 4. सुरक्षा पर खर्च: भारत में दौरान केंद्रीय पुलिस बलों की तैनाती होती है। सुरक्षा व्यवस्था के अंतर्गत पैरामिलिट्री फोर्स, स्थानीय पुलिस, और खुफिया एजेंसियों की भागीदारी रहती है। यह व्यवस्था देश के हर हिस्से में पारदर्शी और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए जरूरी होती है।
  • 5. तकनीकी और डिजिटल सिस्टम: मतदान प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए EVM और VVPAT मशीनों पर हर साल भारी निवेश किया जाता है। आयोग ने 2024 में लगभग 30 लाख EVM और 17 लाख VVPAT मशीनों का उपयोग किया, जिनकी खरीद और रखरखाव पर लगभग 4,000 करोड़ रुपये खर्च हुए।
चुनाव मे कितना खर्च होता है
चुनाव

क्या लोकतंत्र की कीमत बहुत ज्यादा है?

लोकतंत्र में जनता की आवाज ही सबसे बड़ी ताकत होती है, लेकिन अगर उस आवाज तक पहुंचने का रास्ता इतना महंगा हो गया है तो यह चिंता का विषय है।

अधिक खर्च का सीधा असर छोटे और क्षेत्रीय दलों पर पड़ता है जो बड़े दलों के प्रचार खर्च का मुकाबला नहीं कर पाते।

इससे राजनीति में पैसे का वर्चस्व बढ़ता है, और लोकतांत्रिक संतुलन धीरे-धीरे कमजोर होता जाता है।

चुनाव me कितना खर्च
चुनाव

इलेक्शन मे बेहतर पारदर्शिता की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी खर्च को नियंत्रित करने के लिए मजबूत नियमन और फंडिंग की पारदर्शी प्रणाली की आवश्यकता है।

चुनावी बॉन्ड जैसी व्यवस्थाएं पारदर्शिता के लिए बनाई गई थीं, लेकिन उनकी गुप्त प्रकृति ने उल्टा सवाल खड़े कर दिए। स्थायी समाधान के लिए सार्वजनिक चुनावी फंडिंग और सख्त निगरानी जरूरी है।

भारत में इलेक्शन केवल लोकतंत्र का उत्सव नहीं, बल्कि एक आर्थिक गतिविधि भी बन चुका है।

हर वोट की कीमत सिर्फ लोकतांत्रिक नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी भारी है।

आने वाले वर्षों में यदि इस खर्च को नियंत्रित नहीं किया गया, तो लोकतंत्र की भावना पर धनतंत्र का असर गहराता जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *